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दर्द

अपनों ने जो तोडा दिल तो पता चला, 

कि जो गैरों से मिला था वो दर्द ही न था l


ज़िन्दगी में दर्द का होना तो लाज़मी है, 

पर दर्द ऐसे भी होते हैं, ये पता न था l


हाँ मैंने भी चाहा था कुछ, 

बदले में, उनसे, कैसे बताऊँ, 

कि प्रेम के सिवा कुछ और न चाहा था l


ख़ैर बताने, जताने, समझाने के दौर हुए,अब ख़त्म l 


अपने अँधेरे और अपनी रौशनी के साथ, 

अपनी राह पर, अब अकेले हैं हम…

हाँ अपनी राह पर, अब अकेले हैं हम…


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक


 
 
 

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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
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