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"Glimpses Of Truth"

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क्षमा और ज्ञान
क्षमा यदि शर्तों के साथ है, तो वो क्षमा कहाँ है?-2 आत्ममुग्धता और अहंकार की पराकाष्ठा है, वो क्षमा कहाँ है? ज्ञान और आत्मबोध की ओर पहला कदम, -2 माँगना त्रुटि पर क्षमा, और उसे न दोहराना है l और बिना व्यवहार में लाए, फिर कैसा भी हो ज्ञान, कोरा ही रहता है l हवाई क़िले और काग़ज़ की नाव, कब तक टिक पाती है l समय का एक थपेड़ा, और सब ज़मीन पर आ जाता है l इसलिए किसी को छोटा कहना, आपको बड़ा नहीं बनाता है? आपको आपकी स्थिति से और नीचे ही गिरता है l -2 विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

Vivek Pathak
28 अप्रैल1 मिनट पठन
कश्मकश
क्यों हमेशा, ठोकर चाहिए होती है संभालने के लिए ? क्यों हमेशा, ठोकर चाहिए होती है संभालने के लिए ? आदमी !! समय रहते संभालता क्यों नहीं ? बेकार सी जिद है, कुछ कर दिखाने की, बेकार सी जिद है, कुछ कर दिखाने की l झंझटों में लगा रहता है, आदमी !! जीता क्यों नहीं? झंझटों में लगा रहता है, आदमी !! जीता क्यों नहीं? जिसे नहीं लगाव ज़िंदगी से, उसे मौत नसीब नहीं, और जो चाहता है जीना वो क्यों मर जाता है? विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

Vivek Pathak
18 अप्रैल1 मिनट पठन
मृत्यु और जीवन का सार
जो भी ये आपाधापी है, जितना भी ये शोर है l जिसे समझ रहे हो तुम रोशनी, वो अंधेरा घनघोर है l वो सब तो मिट ही जाना है, जिसको समझ रहे हो तुम अपना l भोजन, निद्रा और मैथुन के परे, जीवन आख़िर क्यों मिला है? ये कभी जाना है l जैसा जिया जीवन, ‘मृत्यु का क्षण’ उसकी निष्पत्ति हैl तो जीवन बने तैयारी उत्सव की, उत्सव हो ‘मृत्यु का वो क्षण’ l बस यही जीवन का है उद्देश्य l बस यही जीवन का है सार l विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

Vivek Pathak
7 अप्रैल1 मिनट पठन
बेटे
पिता के जाने के बाद, अक्सर, बहुत अकेले हो जाते हैं बेटे l आर्थिक स्थिती कैसी भी हो, पर निर्धन हो जाते हैं बेटे l एक ही दिन में अचानक बड़े ही जाते हैं बेटे l दुनिया के सामने तो छाती ताने खड़े रहते हैं, पर अकेले में, बहुत रोते हैं बेटे l और इस तरह एकदिन, अपने पिता से हो जाते हैं बेटे l और इस तरह एकदिन, अपने पिता से हो जाते हैं बेटे l विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

Vivek Pathak
29 मार्च1 मिनट पठन
जोखिम
जीत कर भी उतना नहीं मिलता, जितना हार जाने पर खो जाता है l पर जिसने न लिया जोखिम, वो उतना ही पछताता है l लगा दो जान, चल पड़ो इक ओर, जो पड़ा सोच में, वो अक्सर, मोड़ पर ही, खड़ा रह जाता है l विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

Vivek Pathak
24 मार्च1 मिनट पठन
गुरु कृपा
मई की घाम भी लगे, शशि नीर, ज्यों सुधा बरसे घन घोर l आफ़त में आनंद समावे, दुःख में सुख के भोग जिवावे, पराजय में भी जयकार करावे । गुरु कृपा परसाद अति मीठो, कड़वी माया के सब स्वाद भुलावे l विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

Vivek Pathak
11 मार्च1 मिनट पठन
समझदारी
माया के चक्करों में पड़े रहना बेक़ारी है l व्यक्ति हो या परिस्थिति, अंधे होकर जुड़े रहना, अंतहीन लाचारी है l -2 और तुम्हारे होते ‘उसको’ समझना कठिन है l -2 ख़ुद को मिटा उसमें मिला, ‘समर्पण’ में ही समझदारी है l -2 विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

Vivek Pathak
7 मार्च1 मिनट पठन
तमाशा
जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l उठो बुझा दो इस आग को, अभी भी वक़्त है l-2 जिसे तुम तमाशा समझ देख रहे हो,-2 ये न हो, कि एक दिन तुम भी तमाशा बन जाओ l सुधर जाओ अंधों, अब तो सुधर जाओ l विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

Vivek Pathak
7 जन॰1 मिनट पठन
काशी दर्शन
मैं गया शिव दर्शन को काशी, गलियों में मुझे राम मिले l-2 अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले । देखी मूरत फिर भी प्यासा, टेका माथा फिर भी अधूरा सा l घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2 फिर पितरों को संतुष्ट किया l देखा उसको धैर्य में साधु के, -2 गंगा स्पर्श में महसूस किया l तब जाकर शिव को पाया, चक्षुओं में भक्तों के, तब जाकर शिव को पाया, अश्रुओं में भक्तों के l आया तो था भरा हुआ ख़ुद से, अब सब ख़ाली है, मैं नहीं हूँ, अब बस शिव हैं, मैं नहीं हूँ अब बस शिव हैं, मैं नहीं हूँ

Vivek Pathak
5 जन॰1 मिनट पठन
जोखिम
जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है l हो सकता है ये न कर पाऊँ, हो सकता है वो न कर पाऊँ, पर जो भी कर रहा हूँ, उसमें जोखिम तो है, पर सुकून बड़ा है l जीत के भी मिले सुकून, ये तो जरूरी नहीं, जीत के भी मिले सुकून, ये तो जरूरी नहीं, जिस तरह से चल रहा है ज़माना, जीत तो मिल सकती है, सुकून नहीं l और पैसे से दुनिया है, ये सच

Vivek Pathak
7 दिस॰ 20251 मिनट पठन
पशु कौन?
वो होते हिंसक, सुरक्षा और भोजन के लिए, और हम… स्वाद के लिए, उनके शीश काटते जाते l वो होते काम-रत, ऋतु आने पर ही, और हम… सारा जीवन, काम में ही लुटाते जाते l वो जीते गोद में प्रकृति की, जीवन भर, और हम… मिट्टी, वन, नदी, वायु को मिटाते जाते l कहने को तो वो ही हैं पशु, पर हमको, मानवता का पाठ पढ़ाते जाते l कि हिरण के बच्चे को, छोड़ देती है शेरनी भी, उसका लड़कपन देखकर, और हम हैं कि अपनों को भी नहीं छोड़ते, अवसर पा,बस छलते जाते- छलते जाते l अब आप ही बताओ पशु कौन?, वो या हम? विवेक गोप

Vivek Pathak
8 नव॰ 20251 मिनट पठन
याद की जायदाद
कर-कर के देख लिया, हर क़रम,-2 कमा के देख लिया, गँवा के देख लिया, और पापों से तो सना हूँ मैं,-2 कुछ पुण्य, कमा के भी देख लिया l सब.. सब.. सब आ के चला जाता है, सब आ के चला जाता है l एक ‘उसकी याद’ है, की आके जाती नहीं l -2 और ‘उसकी याद’ में कुछ ऐसी बात है ‘विवेक’,-2 कि दौलत-शौहरत तो एक तरफ़, जश्न-ए-जन्नत और चाहत-ए-जिस्म भी फ़ीका लगता है l और कमाल तो ये है कि, जायदाद-ए -याद कभी मिटती नहीं, बाक़ी सब मिट जाता है l -2 और यही वो दौलत है, जो साथ जाती है l बस यही वो दौलत है, जो साथ जा

Vivek Pathak
31 अक्टू॰ 20251 मिनट पठन
श्मशान
कहते लोग, जिसे भयानक और अशुद्ध, जहाँ जाने के नाम से भी, हो जाती सांसें बद्ध l होते सभी बंधन जहाँ राख़, टूट जाती वृक्ष से ज्यों साख़, है यह वह स्थान, जहाँ माया भी है निषिद्ध l मरके तो सबको जाना है वहाँ, जीतेजी बिताओ कुछ पल वहाँ, तो उतरे ज्ञान विशुद्धl हो रहा जिसके दर्शन से मैं प्रबुद्ध, और हो रहा जिसके दर्शन से मैं प्रबुद्ध, हे! श्मशान, तुमसा गुरु कौन इस जग में l हे! मृत्यु, तुमसा गुरु कौन इस जग में l हे! मृत्यु, तुमसा गुरु कौन इस जग में l विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

Vivek Pathak
21 अक्टू॰ 20251 मिनट पठन
इल्म है मुझे
ये जो लोग, रिश्ते-नातों, दौलत-ओ-शौहरत और तमाम दुनिया को, जीने का सामान समझ रहे हैं l नादान हैं, अपनी ही क़ब्र, ख़ुद खोद रहे हैं l नादान...

Vivek Pathak
13 अक्टू॰ 20251 मिनट पठन
ब्राह्मण होना
जन्मा तो हूँ श्रेष्ठ कुल में, पर मेरा श्रेष्ठ होना अभी बाक़ी है l एक-दो से तो छूटा नहीं पूरी तरह, अभी तो कई दोष मुझमें बाक़ी हैं l चलना...

Vivek Pathak
30 अग॰ 20251 मिनट पठन
रिश्ते
जो बच्चों को विदेश भेज इतराते हैं, अक्सर जीवन अकेले में बिताते पाए जाते हैं l पैसे तो हर महीने आ जाते हैं, पर होली-दिवाली पे, घर-बार सूने...

Vivek Pathak
26 अग॰ 20251 मिनट पठन
मेरी पुकार
ऐसा नहीं कि न पुकारूँ, तो आप सुनते नहीं, बिन मांगे भी दिया है, बहुत कुछ हर बारl पहले धो तो लूँ कर्मों के दाग़, एक बार, पहले लीप तो लूँ...

Vivek Pathak
16 अग॰ 20251 मिनट पठन
माँ !! तुम मुझसे क्यों लड़ती हो?
माँ !! तुम मुझसे क्यों लड़ती हो?-2 हाँ, पर गिरता हूँ तो हाथ भी पकड़ती हो l माँ !! फिर तुम मुझसे क्यों लड़ती हो? मेरे लिए एक तुम ही हो, पर...

Vivek Pathak
17 जुल॰ 20251 मिनट पठन
ख़ाली हाथ
जो अक्सर रहता नहीं, ज़माने के क़ाबिल, कर-कर के भी, मिलती नहीं जिसको मंज़िल l लोगों के बड़े काम का होता है वो शख़्स, जो ख़ुद, किसी काम का...

Vivek Pathak
5 जुल॰ 20251 मिनट पठन
कुछ ख़ास नहीं
कहने को ज़िंदगी में है बहुत, पर कुछ ख़ास नहीं, -2 जी तो रहें हैं सब, पर जीने में वो बात नहीं l यूँ तो अहसास से भरे हैं सब, -2 पर होते...

Vivek Pathak
25 जून 20251 मिनट पठन
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