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रिश्ते

जो बच्चों को विदेश भेज इतराते हैं,

अक्सर जीवन अकेले में बिताते पाए जाते हैं l


पैसे तो हर महीने आ जाते हैं,

पर होली-दिवाली पे, घर-बार सूने रह जाते हैं ।


मेरा बेटा- मेरी बेटी, थकते नहीं, डींगें हाँकते जाते हैं,

पर रिश्तों के सुख के लिए,

अनजानों से उम्मीदें लगाते पाए जाते हैं l


जो बच्चों को विदेश भेज इतराते हैं,

अक्सर पड़ोसियों के कंधों पर श्मशान जाते हैं l


ज़माने की दौड़ में, कमाने की होड़ में,

थोड़े पीछे रह जाओ, तो भी चलता है l


पर जिनके लिए दौड़े, वो पीछे रह जाएँ,

रिश्ते, ऐसे तो निभाये नहीं जाते l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

 
 
 

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