top of page
खोज करे

इल्म है मुझे

13 अक्टू॰ 2025
1 मिनट पठन

ये जो लोग, रिश्ते-नातों,

दौलत-ओ-शौहरत और तमाम दुनिया को,

जीने का सामान समझ रहे हैं l


नादान हैं, अपनी ही क़ब्र, ख़ुद खोद रहे हैं l

नादान हैं, अपनी ही क़ब्र, ख़ुद खोद रहे हैं l


बहुत हुआ इन सब के लिए, ठहरना अब,


की जिधर निकलो, ये तमाशे आम हो रहे हैं l

की जिधर निकलो, ये तमाशे आम हो रहे हैं l


अरे!! असली परेशानी तो ये है, कि इल्म है मुझे,

फिर शिकायत किससे करूँ,


कि अपने किए के ही ईनाम मिल रहे हैं l

कि अपने किए के ही ईनाम मिल रहे हैं l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक



 
 
 

हाल ही के पोस्ट्स

सभी देखें
वहम

ख़्वाब हो या मकान, ख़्वाब हो या मकान, जब तक ख़ुद का ना जले, कहाँ फ़र्क़ पड़ता है l और दूसरों के जनाज़ों में, मैंने लोगों को कहते सुना है, दूसरों के जनाज़ों में, मैंने लोगों को कहते सुना है, कितनी देर

 
 
 
आँसू दवा हैं

अकेले में ही नहा गया, जो अपने अश्कों से, अकेले में ही नहा गया, जो अपने अश्कों से l और ख़ुद ही मिटा लिया जिसने, आँखों से उतरती ग़मों की इन क़तारों को l लब पे कोई शिकायत भी नहीं, लब पे कोई शिकायत भी नही

 
 
 
वहम l भ्रम

ख़्वाब हो या मकान, ख़्वाब हो या मकान, जब तक दूसरे का ना जले, कहाँ फ़र्क़ पड़ता है l दूसरों के जनाज़ों में, मैंने लोगों को कहते सुना है, कितनी देर और लगेगी, कितनी देर और लगेगी, घर पर खाना बना है l और व

 
 
 

टिप्पणियां


bottom of page