काशी दर्शन
- Vivek Pathak

- 5 जन॰
- 1 मिनट पठन
मैं गया शिव दर्शन को काशी,
गलियों में मुझे राम मिले l-2
अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले ।
देखी मूरत फिर भी प्यासा,
टेका माथा फिर भी अधूरा सा l
घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2
फिर पितरों को संतुष्ट किया l
देखा उसको धैर्य में साधु के, -2
गंगा स्पर्श में महसूस किया l
तब जाकर शिव को पाया, चक्षुओं में भक्तों के,
तब जाकर शिव को पाया, अश्रुओं में भक्तों के l
आया तो था भरा हुआ ख़ुद से, अब सब ख़ाली है,
मैं नहीं हूँ, अब बस शिव हैं, मैं नहीं हूँ
अब बस शिव हैं, मैं नहीं हूँ l
विवेक गोपाल कृष्ण पाठक














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