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काशी दर्शन

मैं गया शिव दर्शन को काशी,

गलियों में मुझे राम मिले l-2

अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले ।


देखी मूरत फिर भी प्यासा,

टेका माथा फिर भी अधूरा सा l


घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2

फिर पितरों को संतुष्ट किया l

देखा उसको धैर्य में साधु के, -2

गंगा स्पर्श में महसूस किया l


तब जाकर शिव को पाया, चक्षुओं में भक्तों के,

तब जाकर शिव को पाया, अश्रुओं में भक्तों के l


आया तो था भरा हुआ ख़ुद से, अब सब ख़ाली है,

मैं नहीं हूँ, अब बस शिव हैं, मैं नहीं हूँ

अब बस शिव हैं, मैं नहीं हूँ l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक


 
 
 

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तमाशा

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