top of page
खोज करे

तबाह हूँ मैं

अपनी कहानी का इकलौता गवाह हूँ मैं,

सिर्फ़ मैं ही जानता हूँ, कि कितना तबाह हूँ मैं l -2


जहाँ को जीतने का फ़न, खोया मैंने,

हर क़दम पे, बस हारा हूँ मैं l -2


इक तू बचा है, जो अब भी मेरे पास है,

जीते रहने की, यही बस इकलौती आस है l -2


तू मिलेगा या नहीं ये तो मुझे पता नहीं,

चलते रहना है बस, जब तक तन में साँस है l -2


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

 
 
 

हाल ही के पोस्ट्स

सभी देखें
तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
काशी दर्शन

मैं गया शिव दर्शन को काशी, गलियों में मुझे राम मिले l-2 अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले । देखी मूरत फिर भी प्यासा, टेका माथा फिर भी अधूरा सा l घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2 फिर पितरों

 
 
 
जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

टिप्पणियां


bottom of page