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अपनों का ग़म

अचानक टूट के, बिलख के रो पड़ना,

भरे बाज़ार में भी वीराना सा लगना l

जिसके बिना अब, कोई अपना नहीं लगता,

जिसके बिना हर सुख, बेमानी सा लगता l


वो तो चला गया हमेशा के लिए,

फ़िर ये टीज, क्यों उठती रहती है l

हर रंग शायद उससे ही था,

इसीलिए अब सब, बेरंगा सा लगता है l


थीं तुमसे बहुत शिकायतें, अब भी हैं,

थीं तुमसे बहुत शिकायतें, अब भी हैं,

शिकवों को लगके गले, है मिटाया जाता,

पर मुंह मोड़ के यूँ , न कभी, है जाया जाता l


अगर एक मौक़ा और मिले,

मिटा के ख़ुद को, तुम्हें आबाद कर दूँ,

तुम आजाओ वापस चाहे मैं विदा हो जाऊँ l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

 
 
 

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