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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या?

हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2


अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2


जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l

और

जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l


उठो बुझा दो इस आग को, अभी भी वक़्त है l-2


जिसे तुम तमाशा समझ देख रहे हो,-2

ये न हो, कि एक दिन तुम भी तमाशा बन जाओ l


सुधर जाओ अंधों, अब तो सुधर जाओ l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

 
 
 

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