तमाशा
- Vivek Pathak

- 7 जन॰
- 1 मिनट पठन
जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या?
हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2
अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2
जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l
और
जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l
उठो बुझा दो इस आग को, अभी भी वक़्त है l-2
जिसे तुम तमाशा समझ देख रहे हो,-2
ये न हो, कि एक दिन तुम भी तमाशा बन जाओ l
सुधर जाओ अंधों, अब तो सुधर जाओ l
विवेक गोपाल कृष्ण पाठक














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