जोखिम
- Vivek Pathak

- 7 दिस॰ 2025
- 1 मिनट पठन
जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम,
ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है,
बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l
फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा?
जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है l
हो सकता है ये न कर पाऊँ,
हो सकता है वो न कर पाऊँ,
पर जो भी कर रहा हूँ, उसमें जोखिम तो है,
पर सुकून बड़ा है l
जीत के भी मिले सुकून, ये तो जरूरी नहीं,
जीत के भी मिले सुकून, ये तो जरूरी नहीं,
जिस तरह से चल रहा है ज़माना,
जीत तो मिल सकती है, सुकून नहीं l
और पैसे से दुनिया है, ये सच है,
पैसे दुनिया है, ये तो सच है,
पर सुकून नहीं, सुकून नहीं l
विवेक गोपाल कृष्ण पाठक














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