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कुछ ख़ास नहीं

कहने को ज़िंदगी में है बहुत, पर कुछ ख़ास नहीं, -2

जी तो रहें हैं सब, पर जीने में वो बात नहीं l


यूँ तो अहसास से भरे हैं सब, -2

पर होते किसे के पूरे, जज़्बात नहीं l


और जब चुभता है कमीं का शूल, तो रोते हैं, -2

कि अपना लिया क़र्ज़ा है, जो गए हैं चुकाना भूल l


दौलत ही सबकुछ है, ये सही नहीं, -2

पर ये कहना भी मुक़म्मल तभी, जब वो पास है l


जो नहीं मिला, उसके पीछे ही भागती है दुनिया, -2

थोड़ा रुके तो जाने ज़माना,

कि जो मिला है वही ख़ास है l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

 
 
 

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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
काशी दर्शन

मैं गया शिव दर्शन को काशी, गलियों में मुझे राम मिले l-2 अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले । देखी मूरत फिर भी प्यासा, टेका माथा फिर भी अधूरा सा l घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2 फिर पितरों

 
 
 
जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

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