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I am God l अनल-हक l अहंब्रह्ममास्मि

जो मिली है बसीरत (प्रतिभा), बदले उसके दौलत मिले न मिले l

ज़हन में उतरी इस रोशनी को बांटकर, सुकूं चाहता हूँ l


भर जाता हूँ जब तेरी क़ुरबत (घनिष्ठता) के पानी से, सर तक,बहते अश्क़ों से हर तरफ़ हरियाली चाहता हूँ l


आफ़ताब-ओ-महताब, चराग़ों से लगते हैं, मेरे आगे,

जब तेरी रौशनी में नहाकर, घर से निकलता हूँ l


जब गोपाल-कृष्ण मेरे नाम में ही हैं, तो किसी और तख़ल्लुस (pen-name) की दरकार ही कहाँ ?


लिखूँ कुछ भी, हर बात में तू ही होता है, तू हवा मैं परचम हूँ, मेरी हर हरक़त, तेरा ही निशां होता है l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक


 
 
 

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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
काशी दर्शन

मैं गया शिव दर्शन को काशी, गलियों में मुझे राम मिले l-2 अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले । देखी मूरत फिर भी प्यासा, टेका माथा फिर भी अधूरा सा l घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2 फिर पितरों

 
 
 
जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

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