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अंतर का ख़ज़ाना

न जाने क्यों हर तरफ़, अब कमीं नज़र आती है,

न जाने क्यों हर तरफ़, अब कमीं नज़र आती है,


जब से मिली है ख़बर अंतर के ख़ज़ाने की,

बाहर के सोने की चमक,

अब और फीकी होती जाती है l -2


ऐसा नहीं, ऐसा नहीं,

कि दौलत ए ज़माने का कोई मोल नहीं l


पर इसके लिए ख़ुदी को खोते जाना !!

पर इसके लिए ख़ुदी को खोते जाना !!


ज़माने में मुझे अब, हर तरफ़, ग़मी नज़र आती है l

ज़माने में मुझे अब, हर तरफ़, ग़मी नज़र आती है l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक





 
 
 

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