top of page
खोज करे

अक्सर लोग उन्हें पागल समझते हैं

कि जो इस दुनिया को अच्छी तरह समझते हैं, की जो मैं-मुझे-मेरा से बढ़कर औरों का दर्द भी समझते हैं, कि जो पशुओं को भी अपनी संतान सा समझते हैं, कि जो नहीं देख सकते अनाथ-लाचार को और अपने हिस्से कि खुशियाँ भी बाँटते फिरते हैं l


अक्सर लोग उन्हें पागल समझते हैं l


कि जो भूखे को भोजन देना, शिव का अभिषेख समझते हैं, कि जो बीमार-अपाहिज की सेवा को यज्ञ समझते हैं, कि जो सर्वधर्म समभाव के खोखले आख्यान नकार के, सनातनी होने पर गर्व करते हैं, 

कि जो अपनी संस्कृति को, कमाई के साधनों से पहले रखते हैं, कि जो पूर्वजों के संघर्ष-समर्पण की लाज रखने को, अपना कर्तव्य समझते हैं l

अक्सर लोग उन्हें पागल समझते हैं l

हाँ अक्सर लोग उन्हें पागल समझते हैं l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

 
 
 

हाल ही के पोस्ट्स

सभी देखें
तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
काशी दर्शन

मैं गया शिव दर्शन को काशी, गलियों में मुझे राम मिले l-2 अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले । देखी मूरत फिर भी प्यासा, टेका माथा फिर भी अधूरा सा l घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2 फिर पितरों

 
 
 
जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

टिप्पणियां


bottom of page