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अपने होने का औचित्य!

अपडेट करने की तारीख: 16 अप्रैल 2023

किसी ने क्या खूब कहा है कि, 

जरूरी नहीं हर किसी को मंज़िल मिल जाय l


तो ज़नाब किया क्या जाये?

मुझे लगता है दिया बनके राहों को रोशन किया जाये l


लोग कहते हैं तुम्हारा दिया इस अँधेरे को मिटा पायेगा?

और मैं कहता हूँ, कम से कम मेरा होना सार्थक हो जायेगा l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक



 
 
 

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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
काशी दर्शन

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जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

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