इत्र ए ज़िन्दगी
- Vivek Pathak

- 21 अग॰ 2022
- 1 मिनट पठन
जिसके सामने आईना रखा, वो ही हमसे रूठ गया,
हम ज़माने से अलग हुए और ज़माना हमसे टूट गया।
मैंने कई बार खुद को टूटा, बिखरा और तन्हा पाया,
जो भी चाहा पाना वो ही हमसे छूट गया।
उम्मीदों का टूटना हुआ, ना उम्मीदी आलम छाया,
यकायक से खुद को, तन्हा ओ बेज़ार पाया।
जिस खुशनुमा बादल से थी दुनिया मेरी,
वो भी बरस के पानी हो गया, हम ज़मी पे गिरे और वो आसमानी हो गया।
लगा खत्म ए सफर ज़िन्दगी का होने को ही है अब,
अंधेरी रात का सवेरा, फिर कुछ इस तरह हुआ,
कि बुझते चरागों ने रोशनी को, हम से पाया,
हम हुए आफताब और ज़िन्दगी का इत्र हमने पाया।।
विवेक गोपाल कृष्ण पाठक














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