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कारण कार्य और परिणाम

कारण बन ही जाता है, भोगने हों अगर कष्ट तो l

राहें खुल ही जाती हैं, मिलनी हों अगर मंज़िलें तो l


कहाँ बच सका है सागर तपने से, 

होनी हो अगर बारिश तो l


अवश्य ही कोई कारण है हर कार्य का, और है संभव, कोई न कोई परिणाम हर कार्य का l

फिर कहना कि, ये क्योँ हुआ? या कि,ये क्योँ नहीं हुआ? बेमानी है l


तुम्हारा किया ही तुम्हारी स्थिती का है कारण, पर परिणाम कैसा होगा?, ये सिर्फ तुम पर है निर्भर l


स्वीकारो स्थिती, संभव का करो प्रयास, फिर चाहे मिले पूर्ण तृप्ति या कि रह जाये अनंत प्यास l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

 
 
 

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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
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मैं गया शिव दर्शन को काशी, गलियों में मुझे राम मिले l-2 अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले । देखी मूरत फिर भी प्यासा, टेका माथा फिर भी अधूरा सा l घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2 फिर पितरों

 
 
 
जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

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