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कैसा हूँ मैं ?

लगता था मुझे कि बहुत बुरा हूँ मैं,

ख़ालिस नहीं हूँ, न ही ख़रा हूँ मैं l


चाहिये ज़र-ओ-ज़मीन और शौहरत,

सबसे अलग़ कहाँ हूँ मैं?

ज़माने की तरह ही, कीचड़ में सना हूँ मैं l


पर जब मैंने ये जाना,

कि किसी के दुःख के, आँसू का कारण नहीं हूँ मैं l

पता है सब मुझे, समझदार हूँ, पर चालक नहीं हूँ मैं l

सुख़, सिर्फ़ अपने पुत्र के लिए नहीं,

औरों की औलाद के लिये भी माँगता हूँ मैं l


मिली है जो सफ़लता मुझे, उसकी कृपा से,

कम से कम उतनी तो, हर किसी के लिये चाहता हूँ मैं l


जितना समझता था बुरा ख़ुद को,

उतना भी बुरा नहीं हूँ मैं, उतना भी बुरा नहीं हूँ मैं l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक


 
 
 

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