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क्यों चाहिए सब?

पैसा, ज़र-ओ-ज़मीन, मोहब्बत, वारिस, औरत और सबसे ऊपर ताक़त...

आदमी को सब चाहिए...-2

उसपे, जितना मिल गया काफी नहीं, और चाहिए...-2

देखता नहीं रुककर पल भर भी, कि क्यों आया है?-2

बस दौड़ता रहता है, और के फेर में...


गँवा देता है आजको बस इसलिए, कि कल जीसके-2

एक तो ज़रूरी नहीं कि कल आये...

दूजा आएगा भी, तो आज बनके ही आएगा..-2

यही एक पल है जीलो इसे, ऐसे...-2


कि ख़ुद का पेट भरा हो,

तो औरों की भूख मिटा पाओ...

चेहरे पे तुम्हारे मुस्कुराहट हो,

तो रोते के आँसू पोंछ पाओ...

और जो हार गया हो जीवन से,

उसे जीना सिखा पाओ l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

 
 
 

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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
काशी दर्शन

मैं गया शिव दर्शन को काशी, गलियों में मुझे राम मिले l-2 अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले । देखी मूरत फिर भी प्यासा, टेका माथा फिर भी अधूरा सा l घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2 फिर पितरों

 
 
 
जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

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