जग जंजाल
- Vivek Pathak

- 3 जून
- 1 मिनट पठन
हे प्रिय, करो कृष्ण का ध्यान, राम का गुण गान गाओ,
यूँ ही इस जग जंजाल से, मुक्ति पाते जाओ l -2
एक कष्ट से निज़ात मिले तो, दूसरा आजाता है, इससे पहले ख़त्म हो दूजा, तीसरा पैदा हो जाता है l
और प्रेम यदि बन जाए मोह तो, व्यर्थ हो जाता है,
व्यवहार यदि न हो अपेक्षा रहित तो,
कर्म-बंधन हो जाता है l
भ्रम में हो प्रिय, की तुम जग को बदल सकते हो,
यदि कुछ कभी बदलता भी है तो, स्वयं के अतिरिक्त कुछ और नहीं l
चाहे कितना भी हो प्रयास, नहीं बन पाओगे जग की नज़र में अच्छा,
करो स्वयं से प्रेम, ये जग नहीं इसके योग्य ‘बच्चा’ l
तुमको बढ़ता देख, तुमको प्रसन्न देख,
चाहे कितना भी हो अपना, भीतर से जल जाता है । -2
तो, काँधे की गठरी को हल्का करते जाओ-2
हे प्रिय, करो कृष्ण का ध्यान, राम का गुण गान गाओ,
यूँ ही इस जग जंजाल से, मुक्ति पाते जाओ l -2
विवेक गोपाल कृष्ण पाठक














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