जीवन और मृत्यु
- Vivek Pathak

- 14 फ़र॰ 2025
- 1 मिनट पठन
शुरू शुरू में, जब ये अनुभव शुरू हुआ था,
मैं दो तीन बार मृत्यु से बहुत डरा था l
लगा था कि जीवन का अंत निकट है,
व्यर्थ गया ये भी अवसर, परिस्थिति विकट है l
जब गया हार, तब मैं जीवन से जीता,
जब गया हार, तब मैं जीवन से जीता,
मिला गुरु का साथ और नया अवसर,
अब मृत्यु मुझे दुलारती है,
गुरु बन मेरा जीवन सँवारती है l
जब से देखा है निकट से और स्वीकारा है इसे,
जीना आख़िर कैसे है, बस तब से ही जाना है,
जीना आख़िर कैसे है, बस तब से ही जाना हैl
विवेक गोपाल कृष्ण पाठक














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