ख़्वाब हो या मकान, ख़्वाब हो या मकान, जब तक ख़ुद का ना जले, कहाँ फ़र्क़ पड़ता है l और दूसरों के जनाज़ों में, मैंने लोगों को कहते सुना है, दूसरों के जनाज़ों में, मैंने लोगों को कहते सुना है, कितनी देर
अकेले में ही नहा गया, जो अपने अश्कों से, अकेले में ही नहा गया, जो अपने अश्कों से l और ख़ुद ही मिटा लिया जिसने, आँखों से उतरती ग़मों की इन क़तारों को l लब पे कोई शिकायत भी नहीं, लब पे कोई शिकायत भी नही
ख़्वाब हो या मकान, ख़्वाब हो या मकान, जब तक दूसरे का ना जले, कहाँ फ़र्क़ पड़ता है l दूसरों के जनाज़ों में, मैंने लोगों को कहते सुना है, कितनी देर और लगेगी, कितनी देर और लगेगी, घर पर खाना बना है l और व
टिप्पणियां