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दुविधा

सच है जो वेदों में लिखा है, कहता हूँ निज अनुभव से l

करके बार बार तौबा, चल पड़ता हूँ उन्ही राहों पर फिर से l

होती कमाई थोड़ी बमुश्किल और खर्चे बेहिसाब से l

जानता हूँ क्यों आया हूँ जग में, फिर भी भटकता हूँ चलते चलते राह से l


पाना-खोना, हँसना-रोना जो होता है राह में, कांधे पर उठाये फिरता हूँ l

परेशान हूँ चल नहीं पता, दबके इस बोझ तले l


सच है कि मंज़िल का मिलना मुमकिन नहीं, भोग न लूँ कर्मों का हिसाब जब तक l और कर पाऊँ कुछ ऐसा, कि न बीते का बोझ हो, न भविष्य का डर l


उतार के कांधे से ये गठरी, हो जाऊँ निडर

उतार के कांधे से ये गठरी, हो जाऊँ निडर


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक


 
 
 

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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
काशी दर्शन

मैं गया शिव दर्शन को काशी, गलियों में मुझे राम मिले l-2 अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले । देखी मूरत फिर भी प्यासा, टेका माथा फिर भी अधूरा सा l घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2 फिर पितरों

 
 
 
जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

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