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द्वन्द

उदास हो जाता हूँ, जब चाहकर भी,

किसी की मदद के लिए रुक नहीं पता हूँ l

जल्दी में हूँ, हूँ भीड़ में, चाहकर भी मुड़ नहीं पाता हूँ l


मन कुछ कहता है, ज़माना कुछ,

किस की सुनु, समझ नहीं पाता हूँ l


है ज़रूरी पैसा,कमाने निकलूँ तो,

ख़ुद को ही, सबसे बड़ा रोड़ा पाता हूँ l


ज्ञान तो है बहुत पर, जब बात अमल की आये,

तो हर बार ख़ुद को, मज़बूर ही पाता हूँ l

सत्य है द्वन्द है संसार पर, जब न हो पाये,

मुक्ति का सच्चा प्रयास,

ख़ुद को बार-बार इसमें, उलझा हुआ पाता हूँ l


माया को दोष दूँ, चाहे प्रारब्ध को कोसूँ, आता है जो भी सामने, उसका कारण स्वयं को ही पाता हूँ l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

 
 
 

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