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न होना ही होना है

तपस्वियों को देखा, त्यागिओं को जाना, 

ज्ञानिओं को समझा, भक्ति को माना l


क्या करूँ जिससे उसको जान पाऊँ,

कैसे उसको महसूस कर पाऊँ,

आख़िर क्या करूँ कि उसको पा जाऊँ l


जैसे हनुमत जपते हर क्षण राम को,

जैसे मीरा भजती प्यारे घनश्याम को,

जैसे नंदी करते प्रतीक्षाभोलेनाथ की l

बस वैसे ही जप पाऊँ मैं, एकबार पूरी तरह से राम को l

बस वैसे ही भज पाऊँ मैं, एकबार मीरा सा घनश्याम को l

बस वैसे ही धार पाऊँ नंदी सा धैर्य एकबार,


और मिट जाऊँ, मिट जाऊँ मैं l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक





 
 
 

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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
काशी दर्शन

मैं गया शिव दर्शन को काशी, गलियों में मुझे राम मिले l-2 अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले । देखी मूरत फिर भी प्यासा, टेका माथा फिर भी अधूरा सा l घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2 फिर पितरों

 
 
 
जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

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