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न होना ही होना है

तपस्वियों को देखा, त्यागिओं को जाना, 

ज्ञानिओं को समझा, भक्ति को माना l


क्या करूँ जिससे उसको जान पाऊँ,

कैसे उसको महसूस कर पाऊँ,

आख़िर क्या करूँ कि उसको पा जाऊँ l


जैसे हनुमत जपते हर क्षण राम को,

जैसे मीरा भजती प्यारे घनश्याम को,

जैसे नंदी करते प्रतीक्षाभोलेनाथ की l

बस वैसे ही जप पाऊँ मैं, एकबार पूरी तरह से राम को l

बस वैसे ही भज पाऊँ मैं, एकबार मीरा सा घनश्याम को l

बस वैसे ही धार पाऊँ नंदी सा धैर्य एकबार,


और मिट जाऊँ, मिट जाऊँ मैं l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक





 
 
 

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