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नए युग का आरंभ

खुल के बाँट रहे जो ‘जन’ को,

खोखले कानूनों की आड़ से l

सारी मानवता दबी जा रही, हैवानियत के पहाड़ से l


स्त्री का भोग, बच्चों का दुरूपयोग,

संबंध सारे बहे जा रहे, कामुकता की बाढ़ से l


सत्ता चाहिए, कब्ज़ा चाहिए, फिर क्या करना है पता नहीं, कैंसर को स्वास्थ्य समझ, निरंकुश हो दहाड़ रहे l


काली के क्रंदन को, वीरभद्र के भुज कंपन को,

हनुमत की हुंकार को, मूर्ख न पहचान रहे l


विनाश इतना भयानक होगा, कि भस्मी को कल्पों तक, जीवन जल का न स्पर्श मिलेगा l


कलि की इस चाल को, अब और न शय मिलेगी, सीधे मात से ही, अब नए युग का आंरभ होगा l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक


 
 
 

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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
काशी दर्शन

मैं गया शिव दर्शन को काशी, गलियों में मुझे राम मिले l-2 अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले । देखी मूरत फिर भी प्यासा, टेका माथा फिर भी अधूरा सा l घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2 फिर पितरों

 
 
 
जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

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