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परिणिती

फिरता रहता था अँधेरी राहों पर, 

भटकता था अनजान शहरों में l

और पाने की चाह में, 

न जाने कितना ख़ुद को खोया हूँ, 

थक गया हूँ, चूर हूँ, न जाने आख़िरी बार, 

कब चैन से सोया हूँ l


जेब में है पैसा, पर ऊँचे महलों में अब वो रस नहीं,

अपना छोटा सा घर, अब माँ की गोद सा लगता है l


बदले में क्या मिलेगा किसी से, 

करने से पहले अब सोचता नहीं l

क्यों परिंदे को पिंजरे में रखूँ , 

बारिश-ओ-धूप बाग़ की, अब सुहानी लगती है l


वो कच्चा आम, वो खुली हवा में, लंबी न सही, पर बेफ़िक्र उड़ान, अब अच्छी लगती है l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

 
 
 

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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
काशी दर्शन

मैं गया शिव दर्शन को काशी, गलियों में मुझे राम मिले l-2 अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले । देखी मूरत फिर भी प्यासा, टेका माथा फिर भी अधूरा सा l घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2 फिर पितरों

 
 
 
जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

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