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परिवर्तन का अनुभव

पूछते हैं लोग, जो भी करते हो वो करके,

क्या बदला तुममें?


मैं कहता हूँ, कड़वा हो या मीठा, हर सच स्वयं से, कहना सीख गया हूँ l


गलतियाँ तो अब भी होती हैं मुझसे, लेकिन पहले से बहुत कम l


जो कष्ट असहनीय थे पहले,

किसी तरह उन्हें स्वीकारकर, सह लेता हूँ l


ऐसा नहीं कि भविष्य का डर, सताता नहीं मुझे, पर थोड़ा बहुत वर्तमान में जीना, सीख ही लिया है मैंने l


और पाया है कि, आत्मा के अमृत-रस का आनंद, जीवन की परेशानियों, विपत्तियों और द्वन्द की कड़वाहट को स्वीकारे बिना, संभव नहीं l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक







 
 
 

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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
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