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बचपन का अहसास

वो सारे अपने, जिनके साथ जीवन जिया, जिनके साथ खेले और बड़े हुए, वो भाई-बहनें, वो मेरे दोस्त।


बह गए सब समय की रेत में,

खो गये कुछ पाने, कर दिखाने की होड़ में,

नए अपनों के साथ, परिवार बसाने की दौड़ में l

शिकायत नहीं है… पर कमी है-2

जीवन में फ़िर वही बात हो,

ख़ुशियों में साथ झूमें, ग़म में हाथों में हाथ हो l एकदूजे के लिए दिल में,

फ़िर वही बचपन वाला अहसास हो l


जानता हूँ जीतता नहीं, इस दुनिया में कोई…

पर जब हार का अहसास हो, कम से कम तब तो, अपनों के साथ का प्रयास हो l


जीवन में फ़िर वही बात हो, एकदूजे के लिए दिल में,

फ़िर वही बचपन वाला अहसास हो l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

 
 
 

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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
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