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मृत्यु और जीवन का सार

7 अप्रैल
1 मिनट पठन

जो भी ये आपाधापी है, जितना भी ये शोर है l

जिसे समझ रहे हो तुम रोशनी, वो अंधेरा घनघोर है l


वो सब तो मिट ही जाना है,

जिसको समझ रहे हो तुम अपना l


भोजन, निद्रा और मैथुन के परे,

जीवन आख़िर क्यों मिला है? ये कभी जाना है l


जैसा जिया जीवन,

‘मृत्यु का क्षण’ उसकी निष्पत्ति हैl


तो जीवन बने तैयारी उत्सव की,

उत्सव हो ‘मृत्यु का वो क्षण’ l


बस यही जीवन का है उद्देश्य l

बस यही जीवन का है सार l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक







 
 
 

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