मृत्यु और जीवन का सार
जो भी ये आपाधापी है, जितना भी ये शोर है l
जिसे समझ रहे हो तुम रोशनी, वो अंधेरा घनघोर है l
वो सब तो मिट ही जाना है,
जिसको समझ रहे हो तुम अपना l
भोजन, निद्रा और मैथुन के परे,
जीवन आख़िर क्यों मिला है? ये कभी जाना है l
जैसा जिया जीवन,
‘मृत्यु का क्षण’ उसकी निष्पत्ति हैl
तो जीवन बने तैयारी उत्सव की,
उत्सव हो ‘मृत्यु का वो क्षण’ l
बस यही जीवन का है उद्देश्य l
बस यही जीवन का है सार l
विवेक गोपाल कृष्ण पाठक















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