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मृत्यु का स्वीकार

मृत्यु में छिपा है, जीवन का सार l -2

व्यर्थ है जीना, बिना किये मृत्यु का स्वीकार ll -2


मित्र हो या शत्रु, अपना हो या पराया, प्रेमी हो या हो जग सारा l

ज़रूरी नहीं कि सफ़र, पूरा हो यहाँ हर किसी का l

कभी भी जाना पड़ सकता है छोड़कर, बसा-बसाया संसार सारा ll


जैसा जिया जीवन, वैसा रहेगा मृत्यु का क्षण l-2

मृत्य-क्षण की स्थिती से, निर्धारित होगी जीव की गति ll


मृत्यु की तैयारी ही, जीने की पूर्णता का है आधार l

व्यर्थ है जीना, बिना किये मृत्यु का स्वीकार ll -2


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक




 
 
 

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