top of page
खोज करे

मृत्यु का स्वीकार

मृत्यु में छिपा है, जीवन का सार l -2

व्यर्थ है जीना, बिना किये मृत्यु का स्वीकार ll -2


मित्र हो या शत्रु, अपना हो या पराया, प्रेमी हो या हो जग सारा l

ज़रूरी नहीं कि सफ़र, पूरा हो यहाँ हर किसी का l

कभी भी जाना पड़ सकता है छोड़कर, बसा-बसाया संसार सारा ll


जैसा जिया जीवन, वैसा रहेगा मृत्यु का क्षण l-2

मृत्य-क्षण की स्थिती से, निर्धारित होगी जीव की गति ll


मृत्यु की तैयारी ही, जीने की पूर्णता का है आधार l

व्यर्थ है जीना, बिना किये मृत्यु का स्वीकार ll -2


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक




 
 
 

हाल ही के पोस्ट्स

सभी देखें
तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
काशी दर्शन

मैं गया शिव दर्शन को काशी, गलियों में मुझे राम मिले l-2 अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले । देखी मूरत फिर भी प्यासा, टेका माथा फिर भी अधूरा सा l घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2 फिर पितरों

 
 
 
जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

टिप्पणियां


bottom of page