मृत्यु से संवाद
- Vivek Pathak

- 9 जून
- 1 मिनट पठन
हे मृत्यु!! मैं नचिकेता सा तो नहीं,
कि ढंग से पूछ सकूँ, तेरा सत्य क्या है?
ऐसा भी नहीं की जग के कष्ट से मैं व्यथित नहीं,
पर जब अपनों पर बीतती है, -2
क्यों सारा ज्ञान धरा रह जाता है?
यदि ये मोह है तो प्रेम क्या है?- 2
स्वयं को मिटा देना, वो भी ये जानते हुए,
कि तुम्हारे समर्पण का कोई मूल्य नहीं l
हे मृत्यु!! सत्य कहना, तुम मित्र हो या शत्रु?
या मात्र जीवन-मृत्यु चक्र के, कोल्हू का बैल हो l
तुम्हारा औचित्य क्या है?
क्यों रहूँ भयभीत मैं तुमसे?,
हे मृत्यु!! मुझे निर्भय कर दो l
यदि योग्य हूँ तो सत्य का दीप,
अंतर में प्रज्वलित कर दो,
हे मृत्यु!! मुझे निर्भय कर दो l
विवेक गोपाल कृष्ण पाठक














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