वहम l भ्रम
ख़्वाब हो या मकान, ख़्वाब हो या मकान,
जब तक दूसरे का ना जले, कहाँ फ़र्क़ पड़ता है l
दूसरों के जनाज़ों में, मैंने लोगों को कहते सुना है,
कितनी देर और लगेगी, कितनी देर और लगेगी,
घर पर खाना बना है l
और
वहम में है आदमी, वहम में है आदमी,
उसको लगता है दूसरे मरते हैं,
उसको लगता है दूसरे मरते हैं,
वो थोड़े ही ना मारने के लिए बना है l
विवेक गोपाल कृष्ण पाठक















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