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वहम l भ्रम

23 सित॰
1 मिनट पठन

ख़्वाब हो या मकान, ख़्वाब हो या मकान,

जब तक दूसरे का ना जले, कहाँ फ़र्क़ पड़ता है l


दूसरों के जनाज़ों में, मैंने लोगों को कहते सुना है,

कितनी देर और लगेगी, कितनी देर और लगेगी,

घर पर खाना बना है l


और


वहम में है आदमी, वहम में है आदमी,

उसको लगता है दूसरे मरते हैं,

उसको लगता है दूसरे मरते हैं,

वो थोड़े ही ना मारने के लिए बना है l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक



 
 
 

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वहम

ख़्वाब हो या मकान, ख़्वाब हो या मकान, जब तक ख़ुद का ना जले, कहाँ फ़र्क़ पड़ता है l और दूसरों के जनाज़ों में, मैंने लोगों को कहते सुना है, दूसरों के जनाज़ों में, मैंने लोगों को कहते सुना है, कितनी देर

 
 
 
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अकेले में ही नहा गया, जो अपने अश्कों से, अकेले में ही नहा गया, जो अपने अश्कों से l और ख़ुद ही मिटा लिया जिसने, आँखों से उतरती ग़मों की इन क़तारों को l लब पे कोई शिकायत भी नहीं, लब पे कोई शिकायत भी नही

 
 
 
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