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वहम

4 दिन पहले
1 मिनट पठन

ख़्वाब हो या मकान, ख़्वाब हो या मकान,

जब तक ख़ुद का ना जले, कहाँ फ़र्क़ पड़ता है l


और


दूसरों के जनाज़ों में, मैंने लोगों को कहते सुना है,

दूसरों के जनाज़ों में, मैंने लोगों को कहते सुना है,


कितनी देर और लगेगी,

अरे भाई कितनी देर और लगेगी,

घर पर खाना बना है l


वहम में है आदमी, उसको लगता है दूसरे मरते हैं,

वो थोड़े ही मरने के लिए बना है l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक


 
 
 

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