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वृक्ष की अभिलाषा

उखड़ भी गया, अपने कर्मों की बाढ़ से तो भी,

धरा पर गिर, बीज से फिर वृक्ष हो जाऊँगा l


न मिली सरिता, सागर तक पहुंचने के लिए तो भी, टिका रहूँगा आँधी, तूफ़ान, अकालों में, करके अपनी जड़ों को गहरा l


अपने बीज़ से, 'वन' बना सागर को रिझाऊँगा,

बूँदों सा एक दिन उसको, ख़ुद पर बरसाऊँगा l


वृक्ष हूँ, धरा से जुड़कर ही,

एक दिन गगन को पा जाऊँगा l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

 
 
 

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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
काशी दर्शन

मैं गया शिव दर्शन को काशी, गलियों में मुझे राम मिले l-2 अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले । देखी मूरत फिर भी प्यासा, टेका माथा फिर भी अधूरा सा l घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2 फिर पितरों

 
 
 
जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

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