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शायर हो बैठा

अपडेट करने की तारीख: 23 अग॰ 2024

ग़ुमान था कि शायर हूँ, ख़ुशनवर हूँ -2


फिर दिनकर, नीरज, मीरा, कबीर, सूर,

निराला को सुन बैठा l


अरे बात यहाँ ख़त्म न हुई-2

ग़ालिब और जौन एलिया को सुना, तो तबाह हो बैठा l


दिमाग़-औ- ज़ुबाँ से कहने में वो बात कहाँ-2

जब ख़ुद पर बीती तो शायर हो बैठा l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

 
 
 

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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
काशी दर्शन

मैं गया शिव दर्शन को काशी, गलियों में मुझे राम मिले l-2 अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले । देखी मूरत फिर भी प्यासा, टेका माथा फिर भी अधूरा सा l घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2 फिर पितरों

 
 
 
जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

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