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संघर्ष और सफ़लता

चमकना सूरज का देखकर, जल जाते हैं चाँद तारे l

पर किसीको नहीं दिखती,उसके ह्रदय की आग प्यारे l


कहते हैं मुझसे तंज़ में वो,कि बेजोड़ है तेरी सफलता,

पर कितनी बार टूटा और बिखरा हूँ,

इसकी नहीं ख़बर, किसी को प्यारे l


कितनी बार टूटा हूँ, कितनी बार बिखरा हूँ,

इसकी नहीं किसी को ख़बर प्यारे l


देखकर दूसरे की सफ़लता,अक्सर जलते हैं सभी l

पर असफ़लता के सागर में, खाये हैं गोते कितने,

ये न, किसी ने जाना कभी l


बिना तपे, बिना टूटे, बिना बिखरे,

जो भी मिलता है, रह जाती नहीं उसकी क़दर कभी l

पर मेहनत और संघर्षों के बाद जो मिले,

उसे छीन पता न कोई, तुमसे कभी l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

 
 
 

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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
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जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

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