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समर्पण की आवश्यकता

  • लेखक की तस्वीर: Vivek Pathak
    Vivek Pathak
  • 21 अक्टू॰ 2022
  • 1 मिनट पठन

दिखने लगे जीवन का सत्य…

जब मुड़ने लगें मुख, जब छूटने लगें हाथ, जब लगने लगें झूठे सब संबंध, जब यौवन में ही हो काया रोगोँ से ग्रसित,

जब सफलता में अतृप्ति मिले और असफलता चहुँ ओर हो l तब दिखने लगे जीवन का सत्य..

अपना किया सब जब अपना न लगे और सब उसको न्योछावर हो, अब चाहे वो बाहर कहीं हो न हो,

पर स्वयं में हर पल उसकी ही प्रतीति हो l

तब दिखने लगे जीवन का सत्य…

जब ज्ञान की सीमा आये और समर्पण ही जीवन का पर्याय लगे

और दिखने लगे जीवन का सत्य l

तो माया का जाल हो या हो भव का सागर,

हो कर्मों की जटिलता या प्रारब्ध के बंधन l

टूट जाते सब कांच की तरह, गल जाते सब मोम की तरह, उड़ जाते सब वाष्प की तरह lफिर होती काल चक्र से मुक्ति

और समर्पण की नाव से संभव नश्वर से अविनाशी की यात्रा ll


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

 
 
 

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