top of page
खोज करे

सरल होना ही बुद्धिमान होनाहै

न समझ हैं जो बकते रहते हैं, ये जताने को,

कि वो समझदार हैं l


न जाना उसने कुछभी, अगर जग को जीतकर भी,

रह जाये ये प्रश्न, कि मैं हूँ कौन?


आ जाता है समझ मैं जिसके कुछ,

अक्सर वो रह जाता है मौन l


समझ के नहीं किया जा सकता कुछ भी ग़लत,

और न समझी में किया यज्ञ भी, हो जाता है व्यर्थ l


मेरी समझ में, आवश्यक नहीं समझदार होना,

और जो सरल न हो सका, उसका तो होना ही है व्यर्थ l


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक

 
 
 

हाल ही के पोस्ट्स

सभी देखें
तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
काशी दर्शन

मैं गया शिव दर्शन को काशी, गलियों में मुझे राम मिले l-2 अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले । देखी मूरत फिर भी प्यासा, टेका माथा फिर भी अधूरा सा l घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2 फिर पितरों

 
 
 
जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

टिप्पणियां


bottom of page