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स्वम् की कमाई

अहसान में किसे मिला है सुकून

और उधार में कहाँ राहत की सांस है-2,


जो बात अपनी थोड़ी सी कमाई में है, 

वो कहीं और नहीं-2 


कि जिम्मेदारिओं से भागकर,

बिना मेहनत किये कहाँ आराम है-2


और जो लोग, उसको पाने के लिए छोड़ देते हैं 

घर-बार, त्याग देते हैं परिवार, तो कैसे संभव होगा ईश्वर का साक्षात्कार l


अपने कष्ट स्वीकारो और अपने सुखों को बांटो-2

और चलते रहो इसी में सार है-2


विवेक गोपाल कृष्ण पाठक


 
 
 

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तमाशा

जलते रहें दूसरे तो, हमें उससे क्या? हमारे यहाँ तो मौसम सर्द है l -2 अपनों को न हो, तब तक दर्द कहाँ दर्द है,-2 जब तक न जलें अपने, तब तक आग कहाँ खलती है l और जब तक न पहुँचे घर तक, आग रौशनी ही लगती है l

 
 
 
काशी दर्शन

मैं गया शिव दर्शन को काशी, गलियों में मुझे राम मिले l-2 अनजाने से चेहरों में भी, राधा और घनश्याम मिले । देखी मूरत फिर भी प्यासा, टेका माथा फिर भी अधूरा सा l घाटों पे काटा, कर्मों को पहले-2 फिर पितरों

 
 
 
जोखिम

जिस राह पर चल रहा हूँ, हार जाने का जोखिम, ज़िम्मेदारियों को, न निभा पाने का जोखिम है, बर्बाद भी हो जाऊँ शायद , इस बात का जोखिम है l फिर सोचता हूँ, कि क्या ऐसा? जिस में जोखिम नहीं, हर बात मैं जोखिम है

 
 
 

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