स्वीकार की महक
- Vivek Pathak

- 21 अग॰ 2022
- 1 मिनट पठन
जो पास है उसे खो जाने दे,
जिसका डर है उसे ही जाने दे।
आशा है जिससे, उससे भी निराश ही जाने दे।
प्रेम की सुगंध आती है जिस ओर से,
उस बाग को भी उजाड़ जाने दे।
जितना होना है बुरा, हो जाने दे।
ज़रा मुझसे भी मेरे कर्मों को रूबरू हो जाने दे।
हो जाने दो कर्मों के इस कचरे को साफ,
दीपावली की सुंदर सुगंध को आने दे।
होंगे मार्ग अनेक तुझ तक आने के,
पर यूँ नहा निवृत्त हो मुझे तुझ तक आने दे।
विवेक गोपाल कृष्ण पाठक














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